हाथो में हथियार होने के बाद अफगानी महिलाओ से डरे तालिबानी, विरोध को छुपाने के लिए बंद कर दी इंटरनेट सर्विस

अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के खिलाफ महिलाओं का आंदोलन देश भर में फैलता जा रहा है. निहत्थी महिलाओं से हथियारबंद तालिबानी भी डर गए हैं जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महिलाओं के विरोध को दबाने के लिए काबुल में इंटरनेट सर्विस बंद कर दी गई है और महिलाओं के आंदोलन-प्रदर्शन को कवर करने वाले पत्रकारों को बुरी तरह से पीटा जा रहा है.

मकसद यही है कि इस आंदोलन की खबरें दुनिया तक न पहुंचने पाएं. अपने खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को दबाने की तालिबान हरसंभव कोशिश कर रहा है. इसी के तहत तालिबान के आंतरिक मंत्रलय द्वारा विरोध की शर्ते जारी की गई हैं, जिसके अनुसार प्रदर्शनकारियों को विरोध प्रदर्शन करने से पहले तालिबान न्याय मंत्रलय से पूर्व अनुमति लेनी होगी और यह भी बताना होगा कि आंदोलन के दौरान क्या-क्या नारे लगाए। जाएंगे. महिलाओं को लेकर तालिबान की सोच कितनी घटिया है इसका पता तालिबान के इसी बयान से लग जाता है कि महिलाएं मंत्री नहीं बन सकती हैं, उन्हें केवल बच्चे पैदा करना चाहिए.’ महिलाओं को वहां खेलकूद से रोक दिया गया है और शिक्षा को लेकर भी इतनी बंदिशें लगा दी गई हैं कि वे प्राथमिक शिक्षा भी बमुश्किल हासिल कर सकती हैं.

उच्च शिक्षा के बारे में तालिबान की मूर्खतापूर्ण सोच को उसकी सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री शेख अब्दुल बाकी हक्कानी के इस कथन से समझ सकते हैं, ‘पीएचडी या मास्टर डिग्री की कोई वैल्यू नहीं है. मुल्लाओं और सत्ता में शामिल तालिबानी नेताओं के पास भी ये डिग्रियां नहीं है. यहां तक कि उनके पास तो हाईस्कूल की डिग्री भी नहीं है, लेकिन फिर भी वे महान हैं.’ ऐसी सोच के साथ तालिबान देश को किस दिशा में लें जाएगा, यह सोचने से भी डर लगता है. निश्चित रूप से तालिबानी सोच रखने वालों की संख्या ज्यादा नहीं है, बहुमत उदारवादी लोगों का ही है लेकिन तालिबान ने हथियारों के बल पर अपने कूरतापूर्ण कृत्यों से उन्हें आतंकित कर रखा है. उन्हें सत्ता में रहने का जितना ज्यादा समय मिलेगा, वे उतना ही देश का बेड़ा गर्क करेंगे. इसलिए वहां की महिलाओं ने अपनी जान की परवाह न करते हुए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का फैसला किया है.

तथ्य यह है कि बिना भयभीत हुए अगर अहिंसक ढंग से शांतिपूर्ण प्रतिरोध किया जाए तो दमनकारी सत्ता को आखिरकार झुकना ही पड़ता है. महात्मा गांधी द्वारा अहिंसक आंदोलन के बल पर भारत को आजाद कराने की मिसाल दुनिया के सामने है. ऐसे समय में जबकि चीन, पाकिस्तान जैसे कुछ मुल्क अपने स्वार्थी के लिए तालिबान की हर तरह से मदद करने में लगे हुए हैं और अमेरिका के बीस साल के सैन्य हस्तक्षेप के हश्र को देखते हुए बाकी दुनिया असमंजस में है, अफगानिस्तान के आम लोगों के सामने यही विकल्प बचता है कि वे खुद निर्भय होकर तालिबान की दमनकारी सत्ता का विरोध करें, क्योंकि अभी विरोध नहीं करने पर हो सकता है उन्हें जिंदगी भर गुलामों जैसा जीवन जीना पड़े,

भारत,अमेरिका और चीन समेत 12 देशों ने एलान कर दिया है कि वे बंदूक वाली सरकार को कोई समर्थन नहीं देंगे.लेकिन इस ऐलान के बावजूद लड़ाकों के हौसले पस्त नहीं हुए हैं और हेरात के बाद अब उन्होंने मुल्क के दूसरे सबसे बड़े शहर कंधार पर भी कब्ज़ा कर लिया है.

ये वही कंधार है जहां 22 साल पहले 24 दिसबंर 1999 को इन्हीं तालिबानियों ने एयर इंडिया के विमान का अपहरण करके 180 यात्रियों को सात दिन तक वहां अपने कब्जे में रखा था. अब तालिबान राजधानी काबुल पर कब्जे के लिए आगे बढ़ रहा है और वो महज 90 किलोमीटर की दूरी पर हैं.संयुक्त राष्ट्र ने कुछ दिन पहले ही ये बताया है कि लगभग 1.8 करोड़ लोगों यानी आधी अफ़ग़ान आबादी को मदद की ज़रूरत है.अगर तालिबान ने काबुल एयरपोर्ट पर कब्ज़ा कर लिया,तो उन तक मदद पहुंचाने का रास्ता ही बंद हो जाएगा.तालिबान के आगे जिस तरह से अफगान आर्मी सरेंडर कर रही है,उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वहां हालात कितने खौफनाक हैं.


इस बीच तुर्की ने कहा है कि वो काबुल एयरपोर्ट को चलाना चाहता है और इसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेना चाहता है. हालांकि तालिबान ने तुर्की को धमकी दे रखी है कि वो काबुल एयरपोर्ट पर अपनी सेना ना भेजे. तुर्की के रक्षा मंत्री ने गुरुवार को कहा था कि काबुल एयरपोर्ट के संचालन को लेकर तुर्की तालिबान से बातचीत कर रहा है. टर्किश रक्षा मंत्री के मुताबिक अगर काबुल एयरपोर्ट बंद हुआ तो अफ़ग़ानिस्तान में कोई भी राजनयिक मिशन काम नहीं कर पाएगा.इससे पहले सीएनएन तुर्क को दिए इंटरव्यू में तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा था कि ”अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ती हिंसा को लेकर वे तालिबान से मिल सकते हैं. हमारी संबंधित एजेंसियां तालिबान के साथ बैठक को लेकर काम कर रही हैं. मैं भी तालिबान के किसी एक नेता से मिल सकता हूँ.”

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