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भारत की प्रथम टांसजेंडर जज बन जोइता मंडल ने तोड़ा मिथक,बनी टांसजेंडर समुदाय के लिए प्रेरणा

दोस्तों अक्सर सफर करते के दौरान बस अथवा ट्रेन में या किसी मंदिर में आपने किन्नरों को तो देखा ही होगा। समाज की सोच भले ही आगे बढ़ गई हो लेकिन आज भी किन्नरों को लोग एक अलग नजरिये से ही देखते हैं। कुछ लोग उनपर तरस खाते हैं तो कुछ उनका मजाक भी बनाते है। जब कि देश मे रहने वाले हम और आप की तरह ही वह भी एक सामान्य नागरिक के सभी अधिकार पाने के हकदार है। लेकिन फिर भी किन्नरों को अपना पेट पालने के लिए लोगों से पैसे मांगने पड़ते हैं। लोगों के घर मांगलिक कार्यों में जा कर नाचना गाना करना पड़ता है। यह सब समाज के किन्नरों के प्रति एक अलग नजरिया रखने के कारण है। आज भी उन्हें अलग दृष्टि से ही देखा जाता है।लेकिन अब समाज मे बदलाव होना शुरू हो चुका है। अब किन्नर समाज भी अपने अधिकारों के प्रति जागृत होता दिख रहा है। आज हम आपको एक ऐसे ही किन्नर के बारे में बताने जा रहे हैं,जिसने समाज की लगाई गई पाबंदियों से आगे निकल कर अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

आज हम बात कर रहे है देश के प्रथम ट्रांसजेंडर जज जोइता मंडल की। जोइता ने कभी अपनी रातें फुटपाथ पर गुजरीं थी। लेकिन आज अपनी प्रतिभा के दम पर इन्होंने समाज को एक बढ़िया जवाब दिया है। इन्होंने केवल अपनी ही एक अलग पहचान नहीं बनाई है बल्कि पूरे किन्नर समाज के प्रति लोगों को अपना नजरिया बदलने के लिए मजबूर कर दिया है। जोइता मंडल वेस्ट बंगाल की निवासी हैं। और जोइता वेस्ट बंगाल के इस्लामपुर के लोक अदालत की जज बनी हैं। जोइता का जज बनने का यह सफर अनेक संघर्षों से भरा हुआ रहा है,अनगिनत कठिनाइयों का सामना करते हुए आखिरकार जोइता ने अपनी एक अलग पहचान बना ली है।

जोइता बताती हैं कि बचपन से ही वे लड़कियों से जुड़ी चीजों के प्रति खींचाव महसूस करते थे। उनके घर वालों को यह सब अच्छा नही लगता था। और फिर समाज के कारण उन्होंने जोइता को घर से निकाल दिया। उस समय जोइता को सड़कों पर गुजारा करना पड़ा था। क्योंकि किन्नर होने के कारण उन्हें किसी होटल में भी कमरा नही मिलता था। खाने लेने जाते में जोइता से कहा जाता था हमय दुआएं दो। जब वे कॉलेज गई तो लोग उनका बहुत मजाक उड़ाते थे,और इसी कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। जोइता बताती हैं कि उनके जीवन में एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें अपना पेट भरने के लिए भीख मांगनी पड़ती थी,या फिर नाच दिखा कर खाने के लिए पैसे जुटाने पड़ते थे।

जोइता बताती हैं कि जब वे अपना पहचान पत्र बनवाने गई तो वहां पर उन्हें यह कहा गया कि वहां पर न जाओ,वहाँ तुम्हारे जैसे लोग नही जाए। इस बात ने जोइता को अंदर से झकझोर कर रख दिया। इसके बाद जोइता ने बहुत संघर्ष किया। जब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेंसजेंडर के हित में फैसला दिया तो और उस फैसले ने जोइता को और मजबूती दे दी। उंसके बाद जोइता अपने जिले में पहली ट्रेंसजेंडर बनी जिन्होंने अपना पहचान पत्र बनवाया ।

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