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कौन हैं सत्येंद्र पाल, जिनके काम की प्रशंसा में आईएफएस अधिकारी ने लिखा- हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

कहते हैं कि जहां चाह वहां राह और इसके साथ ही यहा भी कहा जाता है कि किसी भी काम के बारे में अगर डान लिया जाए तो कुछ भी मुश्किल नहीं होता। उन दोनों कहावतों को यूपी के लाल सत्येंद्र पाल ने सच कर दिखाया। उनके पास किसी स्कूल की इमारत नहीं। फर्नीचर नहीं, अगर यह सब नहीं भी तो उन्हें मेट्रो के लिए इस्तेमाल होने वाले हिस्सों में रोशमी नजर आई और फ्लाइओवर को ही ठिकाना बना लिया। एक स्कूल है, जिसकी इमारत आलीशान नहीं है। और हां, यहां पढ़ने वाले बच्चे खूबसूरत वर्दियों में नहीं आते। उनके क्लासरूम में में प्रोजेक्टर, कुर्सियां और बेंच भी नहीं है। लेकिन उनमें पढने का जुनून जरूर है। इस स्कूल का टीचर खुद एक स्टूडेंट है। यह स्कूल फ्लाईओवर के निर्माण की खातिर रखे कुछ पत्थरों के स्लैब्स में से एक स्लैब के भीतर लगता है, जो पूर्वी दिल्ली यमुना खादर के इलाके में है। इसमें यहां के झुग्गी कैंप में रहमें रहने वाले गरीब परिवारों के बच्चे आते हैं.


इन बच्चों को पढ़ाने वाले टीचर का नाम सत्येंद्र पाल हैं,जो उसी झुग्गी कैंप के निवासी है। 23 वर्षीय सत्येंद्र बीएससीफाइनल ईपढ़ाते हैं। ‘द बेटर इंडिया’ को सत्येंद्र ने बताया, ‘साल 2015 से मैं इन बच्चों को पढ़ा रहा हूं। सिर्फ पांच बच्चों के साथ मैंने शुरुआत की थी और आज 200 बच्चे हैं। मेरे साथ इन 4 वर्षों में दो और साथी (पन्नालाल और कंचन) जुड़े हैं, वे भी बच्चों को पढ़ाते हैं।’सत्येंद्र उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से हैं। लेकिन 2010 में जिंदगी को बेहतर बनाने के मकसद से वह परिवार के साथ दिल्ल शिफ्ट हुए थे। यूपी बोर्ड से बारहवीं करने वाले सत्येंद्र को आर्थिक तंगी और पलायन की वजह से दो-तीन साल के लिए पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी थी। लेकिन सत्येंद्र ने हार नहीं मानी। दिल्ली आकर उन्हें जैसे ही मौका मिला, उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी में डिस्टेंस से ग्रेजुएशन में दाखिला ले लिया।


सत्येंद्र पाल ने 2015 में लगभग एक दर्जन बच्चों के साथ झुग्गी में एक पेड़ के नीचे कक्षाएं लेना शुरू किया था। उन्होंने साथी झुग्गी निवासियों की मदद से एक झोपड़ी के अंदर एक इनडोर कक्षा बनाई और 2020 की शुरुआत तक 300 बच्चे थे।जब पिछले साल मार्च में राष्ट्रव्यापी तालाबंदी की घोषणा की गई थी, तो पाल ने कक्षाएं लेना बंद कर दिया था। हालाँकि, माता-पिता ने उनसे अपने बच्चों को फिर से पढ़ाने का अनुरोध किया। उन्होंने सामाजिक दूरी के लिए सीमित संख्या में छात्रों के लिए जुलाई में कक्षाएं फिर से शुरू कीं। चैरिटीज ने बच्चों के लिए मास्क और सैनिटाइज़र देने में मदद की।


सत्येंद्र पाल एकमात्र ऐसे नहीं है जो कठिन समय में बच्चों को शिक्षित करने के लिए ऊपर और परे चला गया है। दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल थान सिंह कम उम्र के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, जो COVID-19 महामारी के बीच ऑनलाइन कक्षाओं का खर्च नहीं उठा सकते। मैं इस स्कूल को लंबे समय से चला रहा हूं लेकिन महामारी की शुरुआत के दौरान, मैंने इसे बच्चों की सुरक्षा के लिए बंद कर दिया था। लेकिन जब मैंने देखा कि कई छात्र ऑनलाइन कक्षाएं लेने में सक्षम नहीं थे, तो मैंने अपने स्कूल को फिर से शुरू करने का फैसला किया क्योंकि वे डॉन फोन और कंप्यूटर जैसी चीजें नहीं हैं।

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