भाई चलाता था रिक्शा चुडिया बेचती थी माँ,अब बहन ने कलेक्टर बनकर गर्व से सिर ऊँचा किया

किस्मत का लिखा कोई नहीं बदल सकता और जो किस्मत में लिखा होता है वह मिलकर ही रहता है ऐसा ही. कुछ नहीं पता  संसार में कब इंसान की भाग्य उसको किस मोड़ पर ले जाए.यह कभी किसी को नहीं पता होता अगर भाग्य मे  कुछ अच्छा होता है तो वह मिलकर ही रहता है.कहते है ना मेहनत रंग लाती है मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है.तो आज हम बात करने वाले है जिसने अपनी मेहनत और लगन के दाम पर मिसल कायम की है.


हम बात कर रहे है महारष्ट्र नादेड़ की रहने वाली एक ऐसी लड़की की जिसने अपने परिवार का नाम रौशन करदिया है. हम बात करहे है महारष्ट्र की वसीमा शैख़ की जिन्होंने उनके परिवार का नाम रोशन कर दिया और महिला वर्ग के लिए के मिसल बन रही है. वसीमा ने अपने पारिवारिक स्थिति कमजोर होने के कारण काफी मुश्किलों का सामना करते हुए इस मुक़ाम को हासिल किया है.

वसीमा ने महिलाओं की टोपर लिस्ट मे तीसरे रैंक हासिल की है.आपकी जानकारी के लिए बता दें वसीमा शेख को डिप्टी कलेक्टर या उप जिला अधिकारी पद के लिए चुन लिया गया है. वहीं अब वसीमा की सफलता को देखते हुए उनकी दो छोटी बहनें भी सिविल सर्विस की तैयारी में जुट गई है.वसीमा ने अपने बचपन के कठिन दिनों को याद करते हुए कहा यह उस संघर्ष का ही फल है जो मैंने बचपन से झेला और देखा उसी को देखते हुए मैंने कठिन मेहनत की और आज इस मुकाम को हासिल किया है.

वसीमा ने बताया कि” मेरे परिवार में 4 बहने दो भाई हैं और माता-पिता हैं. क्योंकि मेरे अब्बा की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती इसलिए पूरा घर का खर्च मेरी मां को ही उठाना पड़ता है वह खेतों में काम करती है तब जाकर घर खर्च चलाती थी”ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद 2016 में उन्होंने एम पी एस सी की परीक्षा की तैयारी शुरू की थी.और इस परीक्षा को पास करने के लिए कठिन मेहनत से पढ़ाई करनी पड़ती थी.10 12 घंटे पढ़ाई करना पड़ती थी.

उस पर गांव के लोग ताने कसते थे समुदाय के लोग भी बातें बनाया करते विरोध किया करते थे. भाई उन्हें पुणे लेकर आ गए ताकि उन्हें पढ़ाई के लिए अच्छा माहौल मिले और लाइब्रेरी की सुविधा भी मिल सके.वसीमा अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय अपने भाई और अपनी मां को देती है अगर उनके भाई उनकी पढ़ाई में मदद ना करते तो वह पढ़ नहीं पाती.और इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती. मां ने भी बहुत मेहनत की उन को पढ़ाने के लिए घर चलाने के लिए.वसीम नादेड़ से 5 किलोमीटर जोशी सख वी नामक गाँव पैदल चलकर पढ़ने जाती थी.

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