श्रेयस अय्यर का स्टार क्रिकेटर बनने का सफर, किसने दिया अय्यर का साथ-नींव का पत्थर बने पिता

दोस्तों श्रेयस अय्यर का जन्म संतोष अय्यर और रोहिणी अय्यर के घर 6 दिसंबर 1994 को हुआ। उनका परिवार मूल रूप से केरल के त्रिसूर जिले का रहने वाला है। श्रेयस का परिवार फिलहाल मुंबई के वर्ली इलाके मेें रहता है। यहीं श्रेयस का जन्म हुआ। 12 साल की उम्र में मुंबई के शिवाजी पार्क जिमखाना में क्रिकेट खेलते हुए पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी प्रवीण आमरे की नजर उन पर पड़ी, तो उन्होंने श्रेयस को कोचिंग देनेे का निर्णय किया। श्रेयस अय्यर की बेखौफ बल्लेबाजी शैली और तगड़े शॉट लगाने की काबिलियत के चलते जूनियर स्तर पर उनके दोस्त उनकी तुलना भारत के मशहूर सलामी बल्लेबाज रहे वीरेंद्र सहवाग से करते थे।

भारतीय बल्लेबाज श्रेयस अय्यर ने अपने शानदार प्रदर्शन से लोगों के दिलों में अपनी जगह और उम्दा खिलाड़ियों में अपनी अलग पहचान तो बना ली थी, लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम में अपनी उम्मीद के अनुसार जगह बनाने के लिए, उन्हें थोड़ा इंतजार करना पड़ा। साल 2017 में, वनडे में डेब्यू करने के बावजूद, उन्हें पिछले साल विश्व कप के लिए, वह जगह नहीं मिली, जिसके वह हकदार थे। लेकिन पिछले कुछ महीनों में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के खिलाफ शानदार प्रदर्शन के बाद, अय्यर ने खुद अपनी जगह बना ली है।

न्यूजीलैंड के खिलाफ अपने टेस्ट डेब्यू में, अय्यर ने शतकीय पारी खेलकर, करियर का बेहतरीन आगाज किया है। इसके साथ ही, वह डेब्यू टेस्ट मैच में शतक जड़ने वाले भारत के 16वें बल्लेबाज बन गए हैं। अय्यर ने ग्रीन पार्क स्टेडियम पर, 171 गेंदों में 13 चौकों और दो छक्कों की मदद से 105 रन बनाए। संघर्षों में, सुख-दुख में, हर समय जो साथ खड़े रहते हैं, वे होते हैं माता-पिता। उनसे अच्छा थेरेपिस्ट, दुनिया में कोई हो ही नहीं सकता। ऐसे ही माता-पिता की कहानियां ,हमारे भारतीय क्रिकेट टीम से भी जुड़ी हैं। फिर चाहे वे बेहतरीन बल्लेबाज़ युवराज सिंह के माता-पिता हों, या युवा खिलाड़ी श्रेयस अय्यर के कैंसर के दौरान युवराज के अभिभावक उनके साथ रहे, उन्हें मोटिवेट किया। उनके पूरी तरह से उनके ठीक होने के बाद भी, उनके पिता हर मोर्च पर उनके साथ खड़े रहते हैं। उनके लिए आवाज़ उठाते हैं। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि बच्चे चाहे जिस मुकाम पर चले जाएं, चाहे जितने भी सफल हो जाएं, माता-पिता के लिए बच्चे ही रहते हैं।

ऐसी ही कहानी है भारतीय क्रिकेटर श्रेयस अय्यर की भी। उनके पिता ने हर मुमकिन कोशिश की, कि श्रेयस को हर वह खुशी मिले, जिसके वह हकदार हैं। वह सफलता की उन ऊंचाइयों तक जाएं, जहां तक उनके पंखों की उड़ान है। इन सबके लिए, जो चीज़ सबसे ज़रूरी होती है, वह है सही समय पर लिया गया सही फैसला। फिर चाहे वह फैसला माता-पिता का हो या फिर बच्चों का। श्रेयस के पिता, संतोष अय्यर ने एक इंटरव्यू में बताया, “जब श्रेयस चार साल का था, तब हम घर में प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट खेलते थे। फिर भी, वह गेंद को बहुत अच्छे तरह से मिडिल करता था। उसे देखकर मुझे यकीन हो गया कि इस बच्चे में असली प्रतिभा है। इसलिए, उसकी क्षमता और हुनर को निखारने के लिए, हमसे जितना हो सका, हमने किया।

उनकी ट्रेनिंग अच्छी चलने लगी और धीरे-धीरे समय बीतता गया। संतोष अय्यर ने बताया, “एक बार, जब एक कोच ने मुझसे कहा कि आपके बेटे में प्रतिभा तो बहुत है, लेकिन वह अपने रास्ते से भटक गया है। तो मैं थोड़ा चिंतित हो गया। मुझे लगा कि या तो उसे प्यार हो गया है। या फिर वह गलत संगत में पड़ गया है। मुंबई के क्रिकेटर श्रेयस ने अंडर-16 के दिनों में, अपने प्रदर्शन में गिरावट के दौरान, काफी कम उम्र में बेहद मुश्किल समय का सामना किया। हालांकि, उनके पिता हार मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने अपने बेटे के सभी कोच और मेंटर्स को यह पता लगाने के लिए बुलाया कि आखिर क्या गलत हो रहा है? कहां कमी है? और श्रेयस क्यों इतने परेशान और अशांत रहने लगे हैं? लेकिन सबसे बात करने के बावजूद, कुछ खास पता नहीं चला। उस समय मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी काफी थी। तब भी, श्रेयस के पिता संतोष ने बिल्कुल सही फैसला किया। उन्होंने, अपने बेटे पर नकेल कसने या हिदायत देने के बजाय, उन्हें एक खेल मनोवैज्ञानिक के पास ले जाने का निर्णय लिया।

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